खून से सींचा जिसको मैंने,फूल के जैसे पाला है

सौरभ मधुकर
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

बचपन में माँ अपने बच्चों को बोलना सिखाती है और बोलते हुए बच्चों को देख वो बोहोत खुश होती है,पर जब वह बच्चा बड़ा होता है तो माँ को सब के सामने चुप रहना सिखाता है...ये कैसा न्याय है?

खून से सींचा जिसको मैंने,फूल के जैसे पाला है,

आज उसी बेटे ने अपने घर से मुझको निकाला है ।

गर्मी लागि उसको तो मैंने हवा दी अपने आँचल से,

सर्द हवा का झोका आया, लगा लिया अपने दिल से ।

उस पर से मेरी नजर हटी ना, दिन और रात सम्भाला है,

खून से सींचा जिसको मैंने,फूल के जैसे पाला है ॥

वक़्त रहा हो जैसा भी पर उसको कमी ना आने दी,

उसकी इक मुस्कान के खातिर हर कुर्बानी मैंने दी ।

बेटे के सुख की चिंता में अपना गम भी भूला है,

खून से सींचा जिसको मैंने, फूल के जैसे पाला है ॥

आस थी जिस दिन बड़ा आदमी लाल मेरा बन जाएगा,

मुझे सहारा देगा मेरे दूध का कर्ज चुकाएगा ।

आज हूँ उसके घर की मैं दासी,सेठ वो पैसे वाला है,

खून से सींचा जिसको मैंने, फूल के जैसे पाला है ॥

सोनू कहता मत रो मईया, जिसने जैसा बोया है,

आज नहीं तो कल उसने भी वैसा ही फल पाया है ।

माँ के दिल को तोड़ के कोई सुखी ना रहने वाला है,

खून से सींचा जिसको मैंने, फूल के जैसे पाला है ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।