बावा लाल प्यारे दी नित महिमा गावे मैं

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॥ पावन पाठ ॥

बावा लाल प्यारे दी नित महिमा गावे मैं,

ले धूलि चरना दी मस्तक दे लावा मैं,

जो लाल दा बन जावे ओह्दी किस्मत बन्दी है,

तेरी छडा चौकठ न ईशा मेरे मन दी है,

ठर हीर दा जांदा है जद दर्शन पावा मैं,

ले धूलि चरना दी मस्तक दे लावा मैं,

एह्दे सिमरन विच जिसदी विरति जुड़ जन्दी है,

फिर आई मुसीबत भी वापिस मूड जांदी है,

इस दर तो खुशियां दी ले दौलत जावा मैं,

बावा लाल प्यारे दी नित महिमा गावे मैं,

एह सतगुरु है मेरा मैं सेवक हां इसदा,

लभ दा ऐहदी रेहमत हां मेरे लब ते न दिसदा,

ऐसे दियां यादा दी नित ज्योत जगावा मैं,

बावा लाल प्यारे दी नित महिमा गावे मैं,

एह्दे चरना विच फानी सब दे सिर युकदे ने,

सुख झोली पेंदे ने दुःख जन्म दे मूक दे ने,

इस लाल द्वारे ते फिर क्यों न आवा मैं,

बावा लाल प्यारे दी नित महिमा गावे मैं,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।