मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल

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॥ पावन पाठ ॥

मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल,

सूरत वेख प्यारी मैनु चढ़ गई नाम खुमारी अपने गुरा तो मैं बलिहारी,

मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल

पूजिया ने जिह्ना एह्दे दर दिया पोडियां,

ओहना नु ता द्वितीय ने लाला दियां जोड़ियां,

करदे जो अरजोई उसदी मन्नत पूरी होइ मेरे गुरा जेहा न कोई,

मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल

क़स्बा ध्यान पुर बड़ा भागा वाला है,

ऊंचे ढीले वालेया दा रुतबा निराला है,

ऐसा गुरा दा डेरा जिथे सब नु मिले वसेरा,

बड़ा दयालु सतगुरु मेरा

मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल

कई तरसेम जाहे डुबदे भी तारे ने,

काइयाँ दे बिगड़े मुकदर सवार ने

धीरज जाहे ने चारे बाहो फड़ के पार उतारे अपने सतगुरु तो मैं वारे,

मेरी प्रीत लगी है तिलकां वाले दे नाल

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।