अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर इक दिन जम तेरे आवेगा

हरी ॐ शरण
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॥ पावन पाठ ॥

अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर,

इक दिन जम तेरे आवेगा |

सौदा कारन को या जग आया,

पूँजी लाया,मूल गंवाया,

प्रेम नगर का अंत ना पाया,

ज्यों आया त्यों जावैगा |

अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर,

इक दिन जम तेरे आवेगा |

सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता,

या जीवन में क्या-क्या बीता,

सर पाहन का बोझा लीता,

आगे कौन छुड़ावैगा,

अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर,

इक दिन जम तेरे आवेगा |

परले पार मेरा मीता खड़्या,

उस मिलने का ध्यान ना धरया,

टूटी नांव ऊपर जा बैठा,

ग़ाफ़िल गोता खावेगा,

अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर,

इक दिन जम तेरे आवेगा |

दास कबीर कहे समझाई ,

अंत काल तेरो कौन सहाई,

चला अकेला,संग ना काई,

किया आपना पावेगा,

अरे दिल ग़ाफ़िल गफलत मत कर,

इक दिन जम तेरे आवेगा |

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।