श्रीकृष्ण कीर्तन मधुराधिपते श्रीकृष्ण हरे

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

चरण शरण मधुराधिपति, श्रीवृषभानु-कुमारि,

करो हरण त्रय-ताप का, श्रीगोविन्द-मुरारि,

मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

अधर-मधुर मुख मधुर-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

हैं नयन, हास्य-भी-मधुर-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है वाणी-मधुर, चरित-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

हैं वसन-मधुर थिरकन-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है चाल-मधुर अरु भ्रमण-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है मुरली-मधुर मधुर-पदरज, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

कर-कमल-मधुर, हैं चरण-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है नृत्य-मधुर, सब सखा-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है गान, पान-भोजन-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है शयन-मधुर है रूप-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है तिलक-मधुर, सब काम-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

जल मध्य तैरना अति-मधुरम, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है हरण-मधुर स्मरण-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

उद्गार-हृदय के मधुर-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है शान्ति-मधुर गुञ्जा-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

माला-मधुरम् यमुना-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

कालिन्दी-लहरें हैं मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है नीर-मधुर अरविन्द-मधुर, मधुराधुपते श्रीकृष्ण-हरे,

गोपियाँ-मधुर लीला-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

संयोग मधुर है भोग-मधुर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

है चितवन-मधुर कृपा-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

हैं गोप-ग्वाल गौएँ मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

रचना अति-मधुर दलन-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

परिणाम-दलन का भी मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

सब-कुछ मधुरम् मधुरम्-मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

बस एक 'अशोक' नहीं मधुरम्, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

हे दीनबन्धु करुणासागर, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

इस जग में कोई नहीं मेरा, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

कर-कमल बढ़ा निज हृदय लगा, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

सुन भी ले अब राधा प्रियतम, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

कह दो लेलें निज चरण-शरण, मधुराधिपते श्रीकृष्ण-हरे,

वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे, तव चरण 'अशोक' ये विनय करे,

वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे, तव चरण 'अशोक' ये विनय करे,

(रचना- अशोक कुमार खरे)

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।