हे कृष्ण कहाँ हो आओ तुम

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

हे कृष्ण कहाँ हो आओ तुम, क्यूँ भूल गये गौ-माता को,

बसते हैं जिसके रोम-रोम, सब देव 'पुनीत-सुजाता' को,

वृन्दावन में ग्वालों के सँग, ले गौएँ भटके वन-वन में,

सहलाते थे निज हाथों से, यमुना-तीरे वन-उपवन में,

सिहरन कर गौधन निज तन में, करती थीं प्रकट भाव अपने,

किन्तु अब-वे, अनुभव उनको, बनकर रह गये निरा सपने,

कह रँभा-रँभा अम्मा बछड़े, जब माँ के पहलू आते थे,

तब देख दृष्य़ वह मनमोहन ! तुम कितने खुश हो जाते थे,

तुम मुरली तान सुनाते थे, वे दौड़ी-दौड़ी आती थीं,

पा दर्शन तेरे मनमोहन, निज-को वे सुरक्षित पाती थीं,

निज हाथों उनको तृप्त किया, द्वापर-युग में बनकर ग्वाला,

इस कारण जग में नाम पड़ा, हे कृष्ण ! तुम्हारा गोपाला,

क्या हुआ तुम्हारी मुरली को, क्यों नहीं सुनाई देते स्वर,

कानों के दोनें घुमा-घुमा, आतुर हैं सुरीले सुनने स्वर,

अब कोइ करे न परिचर्या, न कोइ उन्हें सहलाता है,

कर झूठा अभिनय सेवा का, नर धेनु-भक्त कहलाता है,

अब मेरी बातें सुनो 'श्याम' तुम ! कभी-कभी मिल पाते हो,

मन की दो बातें तो कहलूँ, हे श्याम ! कहाँ तुम जाते हो,

ऐसी क्या जल्दी जाने की, माना कि काम बहुत होंगे,

कुछ देवों के कुछ मनुज-दनुज, कुछ तिर्यक-योनि के होंगे,

जो पावन गौएँ बसती थीं, हे कृष्ण ! निरन्तर आप हृदय,

सुनते जाओ उनके दुर्दिन, मुरलीधर ! तुमसे यही विनय,

हे श्याम ! दुर्दशा गौओं की, अब देखी-सुनी नहीं जाती,

तेरे इस जग की रीति-नीति, अब सत्पुरुषों को न भाती,

इस कलियुग में अब लोगों को, उनके पालन में रुचि नहीं,

रहने को जगह नहीं उनको, गौ-शाला दिखती नहीं कहीं,

गोबर गौमूत्र से घृणा करें, ऐसी निष्कृष्ट सोच जिनकी,

तब कौन उन्हें बाँधे-छोरे, अरु कौन करे सेवा उनकी,

वे खुले आसमां के नीचे, भूखी-प्यासी रह जाती हैं,

हो ठंडी गरमी या वारिस, कुछ ऐसे ही मर जाती हैं,

गोचर भूमि पर काबिज़ हैं, ये मानव मन-के-मतवारे,

चरने की इनको जगह नहीं, ये जायँ कहाँ गिरधर-प्यारे,

अपना दाना तो ले आते, खेतों खलिहानों से मानव,

पर पशुओं का चारा-भूसा, कुछ-भी न लाते घर मानव,

हो रहा विनाश पहाड़ों का, नित खनिज काष्ठ पाषाण के हित,

मानव कहता जिसको विकास, हे श्याम ! सर्वथा है अनुचित,

मानव की त्रुटियों से कान्हाँ, वन घास-पात से हीन हुए,

नाले सर-सरिता बावड़ियाँ, मनमोहन ! नीर विहीन हुए,

वे फिरती हैं मारी-मारी, तेरे जग में भूखी-प्यासी,

क्यूँ आती नहीं दया तुझको, दुर्दशा देख हे सुख-रासी,

हैं कुछ बातें ऐसीं जिनको, कहने में छाती फटती है,

तुम खुद आकर देखो कान्हाँ ! गौ कैसे आज सिसकती है,

यदि ऐसा हाल रहा कान्हाँ ! तो दूध कहाँ से पायेंगे,

घी मावा छाछ दही माखन, हे श्याम ! कहाँ से पायेंगे,

नवनीत घरों में न होगा तब, क्या तुम श्याम चुराओगे,

फिर कैसे मुनि-जन राधाप्रिय ! तुम माखन-चोर कहाओगे,

जब भोग लगेगा माखन का, तब तुम कह दोगे नकली है,

फिर हम कैसे कह पायेंगे कि, नहीं श्याम ! ये असली है,

अब तूँही जानें हे गुपाल ! कह दिया जो कहना था मुझको,

अब बारी है तेरी 'अशोक' तूँ जानें जो करना तुझको,

अब बारी है तेरी 'अशोक' तूँ जानें जो करना तुझको,

(रचना- अशोक कुमार खरे)

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नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।