मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

मन के बहुत कुरंग हैं, छिन्न छिन्न बदले सोई,

एक ही रंग में जो रहे, ऐसा विरला कोई l

साधु भया तो क्या भया, माला पहरी चार,

बाहर भेस बनाया, भीतर भरा भंगार l

तन को जोगी सब करे, मन को करे न कोई,

सहजे सिद्धि पाईऐ, जो मन शीतल होई l

मन मैला तन उजरा बगुला कपटी अंग

ता सो तो कऊया भला, तन मन एक ही रंग

अरे नहाए धोए क्या भया, जो मन मैल न जाए,

मीन सदा जल में रहे, पर धोए वास न जाए l

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा,

हो मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा ll

आस न मारी, मंदिर में बैठे ll

नाम को छाड़ि, पूजन लागे पत्थरा,

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा xll

कनवा फड़ाए जोगी, जटवा बढो ले ll

दाढी बढ़ाई जोगी,हुआ बकरा,

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा xll

जंगल जाए जोगी, धुनियाँ रमौले ll

काम जराए जोगी, हुआ हिजरा,

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा xll

मथवा मुंडाए जोगी, कपड़ा रंगईले ll

गीता बांच के, हुआ लबरा,

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा xll

*कहत कबीरा, सुनो भाई साधो ll

यम के दरवाजे, बाँध ले जाए पकरा,

मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपरा xll

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।