करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन

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॥ पावन पाठ ॥

करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन,

मात पिता सा दूजा नहीं कोई भगवान,

करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन,

मात पिता ने ये जीवन दिया है,

तेरी ख़ुशी पे खुद को कुर्बान किया है,

पग पग सवारा तेरा प्यारा सा बचपन,

करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन,

ऊँगली पकड़ कर तुझे चलना सिखाया,

अच्छे कर्मो में ढलना सिखाया,

तुझपे लुटाया जिसने अपना ये तन मन,

करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन,

सदा था तू जिनकी आँखों का तारा,

उनके भुढ़ापे का बन जा सहारा,

अंकुश इनकी सेवा से धयन हो जीवन,

करले रे मन सच्चे प्रभु का तू वंदन,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।