ये संतों का प्रेम नगर है यहाँ संभल कर आना जी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

ये संतों का प्रेम नगर है, यहाँ संभल कर आना जी.........

ये प्यासों का प्रेम नगर है, यहाँ संभल कर आना जी

जो भी आए यहाँ कहीं से, हो जाएं दीवाना जी........

ऐसा बरसे रंग यहाँ पर, जनम-जनम तक मन भीगे

फाल्गुन बिना चुनरिया भीगे, सावन बिना भवन भीगे

ऐसी बरखा होय यहाँ पर, बचे ना कोई घराना जी

ये प्यासों का प्रेम नगर है, यहाँ संभल कर आना जी

ये संतों का प्रेम नगर है, यहाँ संभल कर आना जी,,,,,,,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।