सत्संग कीर्तन करले जिन्दे मेरे

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन विविध भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

सत्संग कीर्तन करले जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

कई तर गे गुरा ने कई तारे जिह्ना ओह हरी नाम जपेया,

सत्संग कीर्तन करले जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

माता पिता जे किती न सेवा ओहना की आ पार लंगना,

माता पिता दी किती जिह्ना सेवा ओहना दे वेहड़े पार हो गये,

सत्संग कीर्तन करिये जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

साधु संता दी किती जी न सेवा ओहना की आ पार लंगना

साधु संता दी किती जिह्ना सेवा ओहना दे वेहड़े पार हो गये,

सत्संग कीर्तन करिये जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

जिह्ना किती ना गुरा दी सेवा ओहना की आ पार लंगना,

जिह्ना किती आ गुरा दी सेवा ओहना दे वेहड़े पार हो गये,

सत्संग कीर्तन करिये जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

जिह्ना भूख्या दो रोटियां ना खवइयाँ ओहना की आ पार लगना,

जिह्ना भूख्या दो रोटियां खवाइयाँ ओहना दे वेडे पार हो गये,

सत्संग कीर्तन करिये जिन्दे मेरे जे भव सागर पार लंगना,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।