घर मुड़ आ बालका वे

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॥ पावन पाठ ॥

मैं रोटियां गिन के वे बिशोडा मूल ले बैठी तेरा,

घर मुड़ आ बालका वे कलि दा जी नि लगदा मेरा,

मेथो क्या दा रब पेहचानेया वे ,

तनु लब के चंचल छानेया वे,

ना दुःख रत्नो दा जानिये वे हुन किथे ला लिया डेरा,

घर मुड़ आ बालका वे कलि दा जी नि लगदा मेरा,

मैं देख देख ओह थावा वे जिथे तू चारिया गावा वे,

तेरा लभ दी मैं परछावा वे मेरे दर्द वङाउ केहड़ा,

घर मुड़ आ बालका वे कलि दा जी नि लगदा मेरा,

पुता बिन न बछड़ियाँ मावा वे,

तेरे गम विच न मूक जावा वे,

मैं तेरे तरले पावा वे मैनु दुखा पा लिया गेरा,

घर मुड़ आ बालका वे कलि दा जी नि लगदा मेरा,

मैं भूल के म्हणे मार बैठी,

एवे मैं कर विचार बैठी,

लुह मैं कर हंकार बैठी मेरी ज़िंदगी होइ हनेरा,

घर मुड़ आ बालका वे कलि दा जी नि लगदा मेरा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।