मैं रोटी लेके नाथ दी चली

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॥ पावन पाठ ॥

गाऊआ चारदा नाथ मिल जावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

भोला मुखड़ा नजर ना आवे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

साग सरो दा रोटी मकी दी बनाई मैं,

घूम घूम देख आई सारी ही तलहाइ मैं,

कोई लभ मेरे नाथ ले आवे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

गाऊआ चारदा नाथ मिल जावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

बोहड़ा थले डेक लाइ ओथे भी न लभेया,

बनखंडी घूम आई ओथे भी न लभेया,

भुधि रत्नो न दा दिल गबरावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

गाऊआ चारदा नाथ मिल जावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

आखदे ने लोकि ओहता गुरनाझाडी आया दी,

गोरखा दी मण्डली ने डेरा ओहनू पाया सी,

जोगी मुंद्रा न कना विच पावे,मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

गाऊआ चारदा नाथ मिल जावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

रिंकू तलाइयाँ वाला लभ लभ थकया,

मेरा पौणाहारी सोनी गुफा विच वसेया,

मई रत्नो अवाजा पई मार मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

गाऊआ चारदा नाथ मिल जावे मैं रोटी लेके नाथ दी चली,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।