मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि

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॥ पावन पाठ ॥

मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि जेहड़ा मेहरा दा मीह वरसावे,

मैं हथ जोड़ ध्याओना नि जेहड़ा सबते कर्म कमावे,

मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि जेहड़ा मेहरा दा मीह वरसावे,

रूप है उसदा चन तो सोहना सूंदर फूल शरमाउंदे,

उसदे दर्शन कारण वास्ते देवी देव ध्याउंदे,

नि मैं दर्शन पाना नि जेहड़ा सब नु चरनी लावे.

मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि जेहड़ा मेहरा दा मीह वरसावे,

सच्चे मन नाल जो भी आवे झोलियाँ भर के जावे,

डिगिया नु एह देवे सहारा धुबड़े पार लगावे

नि मैं सच सुनना नि जोगी हथ ते सरो जमावे,

मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि जेहड़ा मेहरा दा मीह वरसावे,

सर्ब कला सम्पूर्ण स्वामी जोगी अंतर यामी,

पुणे वाले बाली वांगु रिंकू नाम ध्यावि,

साहा विच वसाओना नि जिहने भी मैनु साह आवे,

मैं सिद्ध नाथ मनाउना नि जेहड़ा मेहरा दा मीह वरसावे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।