मेरी माँ दे पैरा थले जन्नत वसदी आ

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॥ पावन पाठ ॥

माँ तनु मैं सजदा करदा,

तेथो न कदे न राख्या परदा,

नो महीने कुख विच रख्या एहसान माँ तेरा दे नहीं सकदा,

मैनु खुश रखन ले एमी नित दुआवा करदी आ,

मेरी माँ दे पैरा थले जन्नत वसदी आ,

निके हुंडिया सिर तो उठया बाप मेरे दा साया,

बापू दी कदे याद न आई एहना लाड लड़ाया,

अंदर वड़के रोंदी मट्टू दुःख न कोई दस्दी आ,

मेरी माँ दे पैरा थले जन्नत वसदी आ,

मुख तेरा जद देखा आमिये चैन जेहा मिल जावे,

केहन नु कोई दुःख न लगे भावे जान मेरी चली जावे,

तू ही मक्का तू ही मदीना तू ही रब माँ लगदी आ,

मेरी माँ दे पैरा थले जन्नत वसदी आ,

चाचेया तायेआ मुख मोड़ेया माँ ने गल नाल लाया,

मैनु कोई भी दुःख ना आवे मुश्किला नाल पढ़ाया,

पिंड भड़ोली आज भी सिमी खड़ी उडीका करदी आ,

मेरी माँ दे पैरा थले जन्नत वसदी आ,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।