ये दाना साई तेरा के चुग गया शिरडी में

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॥ पावन पाठ ॥

ये दाना साई तेरा के चुग गया शिरडी में,

मेरे दिल का कबूतर साई ये उड़ गया शिरडी में,

ये दाना साई तेरा के चुग गया शिरडी में

वो दिन नहीं भूलू मैं तेरे शिरडी जाने का,

मुझे मिला नहीं मौका फिर पीछे जाने का,

के दिल के पिंजरे से निकल गया शिरडी में,

मेरे दिल का कबूतर साई ये उड़ गया शिरडी में,

हे साई नाथ तुम सा दिलदार नहीं देखा,

भगतो को करे पागल ऐसा प्यार नहीं देखा,

दीवाना दिल मेरा के बन गया शिरडी में,

मेरे दिल का कबूतर साई ये उड़ गया शिरडी में,

क्या कहना शिरडी वाले ऐसा जाल बिछाया है,

शिरडी से उड़ न सके ऐसा दाना चुगाया है,

पंख बनवारी सा के कट गया शिरडी में,

मेरे दिल का कबूतर साई ये उड़ गया शिरडी में,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।