इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की

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॥ पावन पाठ ॥

मेरी इज्जत क्या जाये मेरी जात भिखारी की,

इज्जत सारी दुनिया में माँ तेरी दातारि की,

अगर मांगने गया कही तो जाये तुम्हारी शान जी,

इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की,

जाये बात तुम्हारी जी जाये नहीं भिखारी की,

मैया मेरी झोली पे छाप लगी सरकारी की,

बात मेरी इज्जत की नहीं है बात तेरे समान की,

इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की,

तू है जग की सेठानी सारे जग में हला है,

जो भी दर पे आता भर्ती उसका पल्ला है,

झोली भर नहीं पाये तो ये सेठानी किस काम की,

इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की,

कल मैं मांगने आया था आज भी मांग ने आता हु,

जितना मुझको देती हो घर का काम चलाता हु,

इतना देदे मेरी ज़िंदगी हो जाये आराम की,

इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की,

किसी को थोड़ा थोड़ा जी किसी को जयदा जयदा जी,

मारे शर्म के वनवारी तुजसे पूछ न पाता जी,

अलग अलग क्या छाप लगाई तूने अपने नाम की,

इस झोली पे छाप लगी है तेरे झुँझन धाम की,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।