किसी का तुम्हे जब सहारा न हो

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

किसी का तुम्हे जब सहारा न हो,

जहां में कोई जब तुम्हारा न हो,

आ जाना तब तुम शरण में मेरी,

मेरा दर खुला है खुला ही रहे गा तुम्हरे लिये

किसी का तुम्हे जब सहारा न हो,

मिले जो ज़माने की ठोकर तुझे उठा कर गले से लगा लुंगी मैं,

जो रुसवा करे तेरे अपने तुझे तो समान तुझको दिलाऊंगी मैं ,

जो गर्दिश में तेरा गुजारा न हो भटकना भी तुझको गवारा न हो,

आ जाना तब तुम शरण में मेरी,

मेरा दर खुला है खुला ही रहे गा तुम्हरे लिये

किसी का तुम्हे जब सहारा न हो,

अकेले नहीं तुम ही संसार में है तुम से कई मेरे दरबार में,

ना छोड़ू गी तुमको मझदार में मिला लुंगी अपने ही परिवार में,

अगर तू किसी का दुलारा न हो किसी की भी आँखों का तारा न हो,

आ जाना तब तुम शरण में मेरी,

मेरा दर खुला है खुला ही रहे गा तुम्हरे लिये

किसी का तुम्हे जब सहारा न हो,

दुखी दीं हीं की मुश्कानो में मेरा रूप तुझको नजर आएगा,

जो इन्शानियत न हो इंसान में वो जानवर ही तो कहलायेगा,

किसी ने तुझे तुझे अगर सवारा न हो तेरी गलतियों को सुदारा न हो,

आ जाना तब तुम शरण में मेरी,

मेरा दर खुला है खुला ही रहे गा तुम्हरे लिये

किसी का तुम्हे जब सहारा न हो,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।