मन मैला और तन को धोए

हरी ॐ शरण
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॥ पावन पाठ ॥

मन मैला और तन को धोए,

फूल को चाहे,कांटे बोये...कांटे बोये ।

मन मैला और तन को धोए...

करे दिखावा भगति का क्यों उजली ओढ़े चादरिया ।

भीतर से मन साफ किया ना, बाहर मांजे गागरिया ।

परमेश्वर नित द्वार पे आया, तू भोला रहा सोए ॥

मन मैला और तन को धोए...

कभी ना मन-मंदिर में तूने प्रेम की ज्योत जगाई ।

सुख पाने तू दर-दर भटके, जनम हुआ दुखदायी ।

अब भी नाम सुमिर ले हरी का, जनम वृथा क्यों खोए ॥

मन मैला और तन को धोए...

साँसों का अनमोल खजाना दिन-दिन लूटता जाए ।

मोती लेने आया तट पे, सीप से मन बहलाए ।

साँचा सुख तो वो ही पाए, शरण प्रभु की होए ॥

मन मैला और तन को धोए...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।