पतित पावन राम - अंतर घट ज्योति संकीर्तन

मीरा बाई
श्री राम भजन भजन श्री राम
॥ दोहा ॥

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

॥ चौपाई ॥

सीता लखन संग वन विचरे, मुनि आश्रम पावन कीन्ह।
दुष्ट दलन सुर काज सँवारे, भक्तों को सुख दीन्ह॥
नाम तुम्हारा तारनहारा, जो जपे मिटे कलेश।
अंतर घट में बास करो प्रभु, मेटो सकल क्लेश॥

मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥

हाथ धनुष सर तरकस सोहे, राजीव लोचन राम।
दीन अनाथ सखा रघुवर जी, कोटि मदन छवि धाम॥
शबरी के बेर प्रेम से खाये, निषाद राज उर लाये।
समता और प्रेम की मूरत, सब संकट हर धाये॥

॥ दोहा ॥

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्त शिरोमणि मीरा बाई का यह अनन्य प्रेम पद सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु गिरधर के चरणों में पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। इस पावन भजन में श्री राम के पतित पावन स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।