वैभव लक्ष्मी - सकल मंगल दायिनी पद

संत रविदास
माता लक्ष्मी भजन भजन माता लक्ष्मी
॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

रिद्धि सिद्धि नव निधि संग लावे, पूरण काज बनावे।
सत्य धर्म की ज्योत जगावे, सुख सम्पति बरसावे॥
कनक वर्ण तन अति मनभावन, कंचन हार विराजे।
जो ध्यावे सोई फल पावे, घर घर मंगल साजे॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

कमल नयन पद्मासन सोहे, हाथ अभय वर मुद्रा।
क्षीरसागर की राजदुलारी, हरहु क्लेश कुल क्षुद्रा॥
श्री हरि संग बिराजे माता, लोक कल्याण प्रदाता।
द्वार तिहारे शीश नवाऊँ, तुम जग की सुखदाता॥

॥ दोहा ॥

कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह निर्मल भक्ति पद आडंबर रहित सात्विक हृदय और समरसता की आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित करता है। इस पावन भजन में माता लक्ष्मी के सुख समृद्धि दायिनी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।