अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो

साध्वी पूर्णिमा जी (पूनम दीदी)
श्री कृष्ण भजन भजन साध्वी पूर्णिमा
॥ दोहा ॥

द्वार खड़े प्रभु देखिये, इक विप्र अति दीन।
शीश पगा न झगा तन में, दुर्बल देह मलीन॥

॥ चौपाई ॥

अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है।
भटकते भटकते न जाने कहाँ से, तुम्हारे महल के करीब आ गया है॥

न सर पे है पगड़ी न तन पे है जामा, बता दो कन्हैया को नाम है सुदामा।
इक बार मोहन से जा कर के कह दो, मिलने सखा बदनसीब आ गया है॥

सुनते ही दौड़े चले आये मोहन, लगाया गले से सुदामा को मोहन।
हुआ रुक्मिणी को बहुत ही अचम्भा, ये कैसा अनोखा नसीब आ गया है॥

अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, कि दर पे सुदामा गरीब आ गया है॥

॥ दोहा ॥

आंसू से धोए चरण प्रभु, दियो परम सम्मान।
भक्त वत्सल भगवान का, गावत वेद पुरान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

द्वारका में सुदामा जी के आगमन और श्री कृष्ण द्वारा अपने बचपन के गरीब सखा को नंगे पाँव दौड़कर गले लगाने का यह कालजयी व हृदयस्पर्शी भजन है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।