आनंदकंद - चितवन अति प्यारी संकीर्तन

संत तुकाराम
श्री कृष्ण भजन भजन श्री कृष्ण
॥ दोहा ॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥

॥ चौपाई ॥

गोप गोपिका संग बिराजे, सुरभिन के रखवार।
प्रेम सुधा बरसावत मोहन, जग के पालनहार॥
अंतर घट में ज्योति जगाई, दूर करो अंधियारा।
तेरे नाम की लगन लगी है, तुम ही प्राण अधारा॥

नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥

यमुना तट पर मुरली बाजे, सुन मन मोहित होय।
रास रचे वन में बनवारी, विरह कलेश सब खोय॥
माखन मिश्री भोग लगाऊँ, चरण कमल बलिहारी।
हे नंदलाल दया अब कीजे, राखो लाज हमारी॥

॥ दोहा ॥

तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

वारकरी संप्रदाय के संत तुकाराम जी का यह अभंग विट्ठल नाम के संकीर्तन से अंतःकरण की शुद्धि और परम शांति का मार्ग दर्शाता है। इस पावन भजन में श्री कृष्ण के मुरलीधर स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।