आनंदकंद - चितवन अति प्यारी संकीर्तन

संत तुलसीदास
श्री कृष्ण भजन भजन श्री कृष्ण
॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

गोप गोपिका संग बिराजे, सुरभिन के रखवार।
प्रेम सुधा बरसावत मोहन, जग के पालनहार॥
अंतर घट में ज्योति जगाई, दूर करो अंधियारा।
तेरे नाम की लगन लगी है, तुम ही प्राण अधारा॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

यमुना तट पर मुरली बाजे, सुन मन मोहित होय।
रास रचे वन में बनवारी, विरह कलेश सब खोय॥
माखन मिश्री भोग लगाऊँ, चरण कमल बलिहारी।
हे नंदलाल दया अब कीजे, राखो लाज हमारी॥

॥ दोहा ॥

तुलसीदास रघुनाथ शरण में, सदा रहे अनुराग।
जाके हृदय राम बसे हैं, सोई परम बड़भाग॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित यह विनय पद दैन्य और शरणागति भाव की पराकाष्ठा है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम की कृपा का आह्वान करता है। इस पावन भजन में श्री कृष्ण के भक्त वत्सल स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।