अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य

पारंपरिक
श्री राम मंत्र Mantra Vedic Mantra
॥ पावन पाठ ॥

अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य का शाब्दिक अर्थ है मैं ब्रह्म हूँ, यहाँ 'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है।

❝ अहं ब्रह्मास्मि अर्थात अन्दर ब्रहमाण्ड की सारी शक्तियाँ है। मैं ब्रह्म का अंश हूँ। ❞

मुझमे ब्रह्म की सर्व शक्तियां हैं या ब्रह्म मुझमे है, यह केवल एक अव्यत्क विचार मात्र है? जैसे हम एक सीधे-साधे निर्धन आदमी से कहें: अरे तू तो अरबपति है। यदि उस आदमी ने कुछ देर के लिए उसे सुना, अपने आसपास देखा, हंसा और कहने वालो को जड़ मूर्ख कह चला गया। अब यदि उसी व्यक्ति में पूर्व संचित गुण व संस्कार हैं और उसने धैर्य पूर्वक मनन किया और उस ब्रह्म को प्राप्त किया।

यह मंत्र रामेश्वरम धाम या वेदान्त ज्ञानमठ का भी महावाक्य है, जो कि दक्षिण दिशा में स्थित भारत के चार धामों में से एक है।

महावाक्य का अर्थ होता है?

अगर इस एक वाक्य को ही अनुसरण करते हुए अपनी जीवन की परम स्थिति का अनुसंधान कर लें, तो आपका यह जीवन सफलता पूर्वक निर्वाह हो जाएगा। इसलिए इसको महावाक्य कहते हैं।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य | यह मंत्र रामेश्वरम धाम या वेदान्त ज्ञानमठ का भी महावाक्य है | Aham Brahmasmi Mahawakya in Saskrit and Hindi

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।