दिनकर रवि - प्रत्यक्ष भुवन स्वामी कीर्तन

संत कबीर
सूर्य देव भजन भजन सूर्य देव
॥ दोहा ॥

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

॥ चौपाई ॥

सप्त अश्व रथ पर असवारी, अरुण सारथी आगे।
उदित भानु जब तिमिर नशावे, सकल जीव सब जागे॥
तेज पुंज आदित्य दिवाकर, नमन करत संसारा।
आरोग्य धन वैभव दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥

ॐ सूर्याय नमः मंत्र जपते, मिटत असाध्य कलेश।
भक्ति भाव से जो जल अर्पे, पावत सुख अशेष॥
प्रत्यक्ष देव भुवन के स्वामी, भास्कर ज्योति अपारा।
कोटि कोटि वंदन हे दिनकर, सब जग का उजियारा॥

॥ दोहा ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, शब्द गहो चित लाय।
हरि सुमिरन बिन मुक्ति नाहीं, जनम अकारथ जाय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर का यह निर्गुण भजन बाह्य आडंबरों को त्यागकर अंतःकरण में सत्य, सत्संग और नाम सुमिरन की महिमा उजागर करता है। इस पावन भजन में सूर्य देव के सकल जगत आत्मा स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।