प्रत्यक्ष देव दिवाकर - तिमिर विदारण तेज कीर्तन

संत तुकाराम
सूर्य देव भजन भजन सूर्य देव
॥ दोहा ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

॥ चौपाई ॥

सप्त अश्व रथ पर असवारी, अरुण सारथी आगे।
उदित भानु जब तिमिर नशावे, सकल जीव सब जागे॥
तेज पुंज आदित्य दिवाकर, नमन करत संसारा।
आरोग्य धन वैभव दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

ज्योति स्वरूप अखंड तुम्हारा, जग का पालनहार दुलारा।
अंधकार से मुक्ति दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

ॐ सूर्याय नमः मंत्र जपते, मिटत असाध्य कलेश।
भक्ति भाव से जो जल अर्पे, पावत सुख अशेष॥
प्रत्यक्ष देव भुवन के स्वामी, भास्कर ज्योति अपारा।
कोटि कोटि वंदन हे दिनकर, सब जग का उजियारा॥

॥ दोहा ॥

तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

वारकरी संप्रदाय के संत तुकाराम जी का यह अभंग विट्ठल नाम के संकीर्तन से अंतःकरण की शुद्धि और परम शांति का मार्ग दर्शाता है। इस पावन भजन में सूर्य देव के सकल जगत आत्मा स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।