जगदम्बे माँ भवानी - ज्योति स्वरूप माता मंगल गान

संत रविदास
माता दुर्गा भजन भजन माता दुर्गा
॥ दोहा ॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

॥ चौपाई ॥

सिंह सवार विराजे मैया, हाथन आयुध सोहे।
शीश मुकुट कुंडल छवि भारी, सुर नर मुनि मन मोहे॥
दुष्ट दलन हे आदि भवानी, जग की पालनहारी।
महिमा अपरंपार तुम्हारी, जाऊं मैं बलिहारी॥

दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥

दयामयी माँ कृपा कीजिये, दीन हीन संताने।
तेरे सिवा जग में कोई नाहिं, जो अंतर्मन जाने॥
जय जय दुर्गे मात भवानी, संकट हरणी माता।
चरणन में नित शीश नवाऊँ, हे सुख सम्पत्ति दाता॥

॥ दोहा ॥

कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह निर्मल भक्ति पद आडंबर रहित सात्विक हृदय और समरसता की आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित करता है। इस पावन भजन में माता दुर्गा के भक्त वत्सला स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।